अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
- मिर्ज़ा ग़ालिब
मुझे मंज़ूर गर तर्क-ए-तअल्लुक़ है रज़ा तेरी
मगर टूटेगा रिश्ता दर्द का आहिस्ता आहिस्ता
- अहमद नदीम क़ासमी
हम एक शहर में थे इक नदी की दूरी पर
और उस नदी में कोई और वक़्त बहता था
- एहतिशाम अली
उन्हें सदियों न भूलेगा ज़माना
यहाँ जो हादसे कल हो गए हैं
- नासिर काज़मी
Urdu Poetry: फूल खिले हैं गुलशन गुलशन