अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अपना घर आने से पहले
इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं
- मोहम्मद अल्वी
आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है
- मुनीर नियाज़ी
जैसी अब है ऐसी हालत में नहीं रह सकता
मैं हमेशा तो मोहब्बत में नहीं रह सकता
- ज़फ़र इक़बाल
बस मोहब्बत बस मोहब्बत बस मोहब्बत जान-ए-मन
बाक़ी सब जज़्बात का इज़हार कम कर दीजिए
- फ़रहत एहसास
Urdu Poetry: मिरी तरफ़ से तो टूटा नहीं कोई रिश्ता