अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तिरे वा'दों पे कहाँ तक मिरा दिल फ़रेब खाए
कोई ऐसा कर बहाना मिरी आस टूट जाए
- फ़ना निज़ामी कानपुरी
मैं अब किसी की भी उम्मीद तोड़ सकता हूँ
मुझे किसी पे भी अब कोई ए'तिबार नहीं
- जव्वाद शैख़
मुझ को ख़्वाहिश ही ढूँढ़ने की न थी
मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा
- जौन एलिया
रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है
- वसीम बरेलवी
Urdu Poetry: और तो क्या था बेचने के लिए, अपनी आँखों के ख़्वाब बेचे हैं