Urdu Poetry: वो अगर तुझ से ख़फ़ा है तू ही जा मिल क्या हुआ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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रंजिशें ऐसी हज़ार आपस में होती हैं दिला
वो अगर तुझ से ख़फ़ा है तू ही जा मिल क्या हुआ 
- जुरअत क़लंदर बख़्श 

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सूरज हूँ ज़िंदगी की रमक़ छोड़ जाऊँगा
मैं डूब भी गया तो शफ़क़ छोड़ जाऊँगा
- इक़बाल साजिद 

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नफ़रत के ख़ज़ाने में तो कुछ भी नहीं बाक़ी
थोड़ा सा गुज़ारे के लिए प्यार बचाएँ
- इरफ़ान सिद्दीक़ी 

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रात को रोज़ डूब जाता है
चाँद को तैरना सिखाना है
- बेदिल हैदरी

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Urdu Poetry: इतने मायूस तो हालात नहीं, लोग किस वास्ते घबराए हैं

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