Urdu Poetry: लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
- बशीर बद्र  

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ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था
- अहमद ख़याल

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आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
- जिगर मुरादाबादी

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क्या तिरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह
कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं
- कामिल बहज़ादी

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Urdu Poetry: कि ख़ुशबू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से

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