Urdu Poetry: तुम मोहब्बत को खेल कहते हो

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
- बशीर बद्र    

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इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का
- फ़ानी बदायूंनी

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ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएँ
- फ़िराक़ गोरखपुरी

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तेरे बग़ैर भी तो ग़नीमत है ज़िंदगी
ख़ुद को गँवा के कौन तिरी जुस्तुजू करे
- अहमद फ़राज़ 

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हम मानते हैं आप बड़े ग़म-गुसार हैं
लेकिन ये आस्तीन में क्या है दिखाइए
- इक़बाल अज़ीम 

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फिर से ख़ुदा बनाएगा कोई नया जहाँ
दुनिया को यूँ मिटाएगी इक्कीसवीं सदी
- बशीर बद्र 

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Urdu Poetry: नगरी नगरी थाह नहीं है लोग बहुत घबराए हैं

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