Urdu Poetry: 'अख़्तर' गुज़रते लम्हों की आहट पे यूँ न चौंक

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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'अख़्तर' गुज़रते लम्हों की आहट पे यूँ न चौंक
इस मातमी जुलूस में इक ज़िंदगी भी है
- अख़्तर होशियारपुरी

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कोई हलचल है न आहट न सदा है कोई
दिल की दहलीज़ पे चुप-चाप खड़ा है कोई
- ख़ुर्शीद अहमद जामी

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मेरी रुस्वाई के अस्बाब हैं मेरे अंदर
आदमी हूँ सो बहुत ख़्वाब हैं मेरे अंदर
- असद बदायूंनी  

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इक शजर ऐसा मोहब्बत का लगाया जाए
जिस का हम-साए के आँगन में भी साया जाए
- ज़फर ज़ैदी 

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Urdu Poetry: और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

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