अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कैसा जादू है समझ आता नहीं
नींद मेरी ख़्वाब सारे आप के
- इब्न-ए-मुफ़्ती
दर्द ओ ग़म दिल की तबीअत बन गए
अब यहाँ आराम ही आराम है
- जिगर मुरादाबादी
दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
ग़म गया सारी काएनात गई
- जिगर मुरादाबादी
ख़ुद-बख़ुद राह लिए जाती है उस की जानिब
अब कहाँ तक है रसाई मुझे मालूम नहीं
- मोहम्मद आज़म
Urdu Poetry: दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए, सामने आइना रख लिया कीजिए