अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
- मिर्ज़ा ग़ालिब
हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर'
उदासी बाल खोले सो रही है
- नासिर काज़मी
कभी जो ख़्वाब था वो पा लिया है
मगर जो खो गई वो चीज़ क्या थी
- जावेद अख़्तर
कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते
किसी की आँख में रह कर सँवर गए होते
- बशीर बद्र
Urdu Poetry: ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है