अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ज़िंदगी कम पढ़े परदेसी का ख़त है 'इबरत'
ये किसी तरह पढ़ा जाए न समझा जाए
- इबरत मछलीशहरी
ख़्वाबों पर इख़्तियार न यादों पे ज़ोर है
कब ज़िंदगी गुज़ारी है अपने हिसाब में
- फ़ातिमा हसन
बड़ा घाटे का सौदा है 'सदा' ये साँस लेना भी
बढ़े है उम्र ज्यूँ-ज्यूँ ज़िंदगी कम होती जाती है
- सदा अम्बालवी
कभी आँखों पे कभी सर पे बिठाए रखना
ज़िंदगी तल्ख़ सही दिल से लगाए रखना
- बख़्श लाइलपुरी
Urdu Poetry: किसे ख़बर थी कि ये वाक़िआ भी होना था