अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
- गुलज़ार
अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए
- उबैदुल्लाह अलीम
ऐश ही ऐश है न सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है
- अली जवाद ज़ैदी
मिरी ज़िंदगी तो गुज़री तिरे हिज्र के सहारे
मिरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना
- जिगर मुरादाबादी
Urdu Poetry: कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा