अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ज़बान दिल की हक़ीक़त को क्या बयाँ करती
किसी का हाल किसी से कहा नहीं जाता
- मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
कोई मिला ही नहीं जिस से हाल-ए-दिल कहते
मिला तो रह गए लफ़्ज़ों के इंतिख़ाब में हम
- अलीना इतरत
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
- बशीर बद्र
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
Urdu Poetry: बहार आई कि दिन होली के आए