अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
- बशीर बद्र
ख़ुद ही परवाने जल गए वर्ना
शम्अ जलती है रौशनी के लिए
- सनम प्रतापगढ़ी
कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला
- अब्दुल हमीद अदम
सुना है शहर का नक़्शा बदल गया 'महफ़ूज़'
तो चल के हम भी ज़रा अपने घर को देखते हैं
- अहमद महफ़ूज़
Urdu Poetry: कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी