अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अगर ऐ नाख़ुदा तूफ़ान से लड़ने का दम-ख़म है
इधर कश्ती न ले आना यहाँ पानी बहुत कम है
- दिवाकर राही
क्या क्या फ़रेब दिल को दिए इज़्तिराब में
उन की तरफ़ से आप लिखे ख़त जवाब में
- दाग़ देहलवी
बहुत गहरी है उस की ख़ामुशी भी
मैं अपने क़द को छोटा पा रही हूँ
- फ़ातिमा हसन
इक घर बना के कितने झमेलों में फँस गए
कितना सुकून बे-सर-ओ-सामानियों में था
- रियाज़ मजीद
Urdu Poetry: सज्दे किसी के दर पे किए जा रहा हूँ मैं