अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
शाम को तेरा हँस कर मिलना
दिन भर की उजरत होती है
- इशरत आफ़रीं
मुझ को मालूम है महबूब-परस्ती का अज़ाब
देर से चाँद निकलना भी ग़लत लगता है
- अहमद कमाल परवाज़ी
ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएँ
- फ़िराक़ गोरखपुरी
मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं
ज़िंदगी भी जान ले कर जाएगी
- अर्श मलसियानी
Urdu Poetry: तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से