अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
आप का ख़त नहीं मिला मुझ को
दौलत-ए-दो-जहाँ मिली मुझ को
- असर लखनवी
क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ
मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में
- मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
- फ़िराक़ गोरखपुरी
Urdu Poetry: ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं