Urdu Poetry: बाहर कितना सन्नाटा है अंदर कितनी वहशत है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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फिर वही लम्बी दो-पहरें हैं फिर वही दिल की हालत है
बाहर कितना सन्नाटा है अंदर कितनी वहशत है
- ऐतबार साजिद

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कौन जाने कि उड़ती हुई धूप भी
किस तरफ़ कौन सी मंज़िलों में गई
- किश्वर नाहीद 

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हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता
- अकबर इलाहाबादी

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गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
- बासिर सुल्तान काज़मी 

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Urdu Poetry: दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं

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