अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
उठते नहीं हैं अब तो दुआ के लिए भी हाथ
किस दर्जा ना-उमीद हैं परवरदिगार से
- अख़्तर शीरानी
ये शाइ'री ये किताबें ये आयतें दिल की
निशानियाँ ये सभी तुझ पे वारना होंगी
- मोहसिन नक़वी
Urdu Poetry: पता अब तक नहीं बदला हमारा, वही घर है वही क़िस्सा हमारा