Urdu Poetry: आईना नहीं दिल मगर आईना-नुमा है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली   

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इक बार जो टूटे तो कभी जुड़ नहीं सकता
आईना नहीं दिल मगर आईना-नुमा है
- रज़ा हमदानी 

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हम किसी को गवाह क्या करते
इस खुले आसमान के आगे
- रसा चुग़ताई 

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दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
-अल्लामा इक़बाल

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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए
- गोपालदास नीरज

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Urdu Poetry: तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं

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