अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
- शकेब जलाली
बोल पड़ता तो मिरी बात मिरी ही रहती
ख़ामुशी ने हैं दिए सब को फ़साने क्या क्या
- अजमल सिद्दीक़ी
नींद मिट्टी की महक सब्ज़े की ठंडक
मुझ को अपना घर बहुत याद आ रहा है
- अब्दुल अहद साज़
ये अदा-ए-बे-नियाज़ी तुझे बेवफ़ा मुबारक
मगर ऐसी बे-रुख़ी क्या कि सलाम तक न पहुँचे
- शकील बदायूंनी
Urdu Poetry: मैंने उस की तरफ़ से ख़त लिक्खा और अपने पते पे भेज दिया