Urdu Poetry: मौसम तुम्हारे साथ का जाने किधर गया

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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मौसम तुम्हारे साथ का जाने किधर गया
तुम आए और बौर न आया दरख़्त पर
- अब्बास ताबिश  

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शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया
- मजरूह सुल्तानपुरी 

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चेहरा खुली किताब है उनवान जो भी दो
जिस रुख़ से भी पढ़ोगे मुझे जान जाओगे
- अज्ञात 

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वस्ल की रात ख़ुशी ने मुझे सोने न दिया
मैं भी बेदार रहा ताले-ए-बेदार के साथ
- जलील मानिकपुरी  

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