अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर
देखो मिरी जाँ आँख लड़ाना नहीं अच्छा
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना था
ज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया
- परवीन शाकिर
उमीद-ओ-बीम के मेहवर से हट के देखते हैं
ज़रा सी देर को दुनिया से कट के देखते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
- शकेब जलाली
Urdu Poetry: सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है