अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अपनी क़िस्मत में सभी कुछ था मगर फूल न थे
तुम अगर फूल न होते तो हमारे होते
- अशफ़ाक़ नासिर
तुझ से बिछड़ूँ तो कोई फूल न महके मुझ में
देख क्या कर्ब है क्या ज़ात की सच्चाई है
- नसीर तुराबी
शाख़ पर हों कि उन के जूड़े में
उम्र है एक रात फूलों की
- शाद फ़िदाई देहलवी
इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के
आज तक सुलगते हैं ज़ख़्म रहगुज़ारों के
- साहिर लुधियानवी
Urdu Poetry: याद आई वो पहली बारिश जब तुझे एक नज़र देखा था