अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
दिखावा ही करना है तो फिर बड़ा कर
तू शाइ'र नहीं ख़ुद को आशिक़ कहा कर
- अनंत गुप्ता
रोज़ अच्छे नहीं लगते आँसू
ख़ास मौक़ों पे मज़ा देते हैं
- मोहम्मद अल्वी
शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ
आँखें मिरी भीगी हुई चेहरा तिरा उतरा हुआ
- बशीर बद्र
नींद आए तो अचानक तिरी आहट सुन लूँ
जाग उठ्ठूँ तो बदन से तिरी ख़ुश्बू आए
- शहज़ाद अहमद
बशीर बद्र के शेर- रोएँगे बहुत लेकिन आँसू नहीं आएँगे