Urdu Poetry: हर जगह ढूँढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से
हर जगह ढूँढ़ता फिरता है मुझे घर मेरा
- निदा फ़ाज़ली 

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उन दिनों घर से अजब रिश्ता था
सारे दरवाज़े गले लगते थे
- मोहम्मद अल्वी 

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एक मुद्दत से अपने घर में हैं
फिर भी लगता है हम सफ़र में हैं
- सय्यद रियाज़ रहीम 

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भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
- सबा अकबराबादी

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अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा
- महशर बदायूंनी 

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हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है
- शकील आज़मी

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Urdu Poetry: कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं

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