अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जो उन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
- फ़िराक़ गोरखपुरी
आँख रहज़न नहीं तो फिर क्या है
लूट लेती है क़ाफ़िला दिल का
- जलील मानिकपुरी
उस की आवाज़ में थे सारे ख़द-ओ-ख़ाल उस के
वो चहकता था तो हँसते थे पर-ओ-बाल उस के
- वज़ीर आग़ा
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है
- कैफ़ी आज़मी
Urdu Poetry: बाहर कितना सन्नाटा है अंदर कितनी वहशत है