Urdu Poetry: क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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सब कुछ तो है क्या ढूँढ़ती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता
- निदा फ़ाज़ली

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ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
- फ़िराक़ गोरखपुरी

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कोई भी घर में समझता न था मिरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
- राजेन्द्र मनचंदा बानी
 

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जाने कितने लोग शामिल थे मिरी तख़्लीक़ में
मैं तो बस अल्फ़ाज़ में था शाएरी में कौन था
- भारत भूषण पन्त

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Urdu Poetry: मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है

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