अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
फूल की ख़ुशबू हवा की चाप शीशे की खनक
कौन सी शय है जो तेरी ख़ुश-बयानी में नहीं
- अज्ञात
मैं उस को खो के भी उस को पुकारती ही रही
कि सारा रब्त तो आवाज़ के सफ़र का था
- मंसूरा अहमद
अभी तक सिर्फ़ आवाज़ें सुनी हैं
अभी तक लिख रही हैं उँगलियाँ इश्क़
- फ़ैसल अज़ीम
रोने वालों से कहो उन का भी रोना रो लें
जिन को मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया
- सुदर्शन फ़ाकिर
हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया
- शहज़ाद अहमद
मुझ में थोड़ी सी जगह भी नहीं नफ़रत के लिए
मैं तो हर वक़्त मोहब्बत से भरा रहता हूँ
- मिर्ज़ा अतहर ज़िया
Urdu Poetry: उसी मक़ाम से अब अपना रास्ता होगा