अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम
- फ़ानी बदायूंनी
चले तो पाँव के नीचे कुचल गई कोई शय
नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है
- शहाब जाफ़री
देखो दुनिया है दिल है
अपनी अपनी मंज़िल है
- महबूब ख़िज़ां
मिरी तो सारी दुनिया बस तुम्ही हो
ग़लत क्या है जो दुनिया-दार हूँ मैं
- रहमान फ़ारिस
Urdu Poetry: दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के