Urdu Poetry: शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
- कफ़ील आज़र अमरोहवी 

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है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
- बशीर बद्र

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मिरे हालात को बस यूँ समझ लो
परिंदे पर शजर रक्खा हुआ है
- शुजा ख़ावर 

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वक़्त करता है परवरिश बरसों
हादिसा एक दम नहीं होता
- क़ाबिल अजमेरी 

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Urdu Poetry: उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

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