अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया
ख़ुश हूँ कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया
- अब्दुल हमीद अदम
कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस 'दाग़' है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं
- दाग़ देहलवी
बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं
कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं
- एजाज़ तवक्कल
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में
जो भी ख़ुश है हम उस से जलते हैं
- जौन एलिया
Urdu Poetry: बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे