Urdu Poetry: दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
- जिगर मुरादाबादी

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एक मंज़िल है मगर राह कई हैं 'अज़हर'
सोचना ये है कि जाओगे किधर से पहले
- अज़हर लखनवी

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पलट आता हूँ मैं मायूस हो कर उन मक़ामों से
जहाँ से सिलसिला नज़दीक-तर होता है मंज़िल का
- अब्र अहसनी गनौरी 

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मुसाफ़िर तिरा ज़िक्र करते रहे
महकता रहा रास्ता देर तक
- अक़ील नोमानी

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