अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
वो कौन था जो दिन के उजाले में खो गया
ये चाँद किस को ढूँढ़ने निकला है शाम से
- आदिल मंसूरी
'ज़फ़र' ज़मीं-ज़ाद थे ज़मीं से ही काम रक्खा
जो आसमानी थे आसमानों में रह गए हैं
- ज़फ़र इक़बाल
गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
- बासिर सुल्तान काज़मी
बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं
कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं
- एजाज़ तवक्कल
Urdu Poetry: आप का ख़त नहीं मिला मुझ को