अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है
- फ़िराक़ गोरखपुरी
वो जंगलों में दरख़्तों पे कूदते फिरना
बुरा बहुत था मगर आज से तो बेहतर था
- मोहम्मद अल्वी
साया है कम खजूर के ऊँचे दरख़्त का
उम्मीद बाँधिए न बड़े आदमी के साथ
- कैफ़ भोपाली
दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो
क़ारून को भी अपना ख़ज़ाना नहीं मिलता
- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
Urdu Poetry: तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता