अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएंगे इक दिन
- साक़ी फ़ारुक़ी
अपना घर आने से पहले
इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं
- मोहम्मद अल्वी
मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर
ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ
- अहमद फ़राज़
ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रक्खो या न रक्खो ख़्वाब मेयारी रखो
- राहत इंदौरी
Urdu Poetry: ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को, अपने अंदाज़ से गँवाने का