Urdu Poetry: हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है
ये तन्हाई अजब लड़की है सन्नाटे में रोती है
- शाहिद कमाल 

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रूप की धूप कहाँ जाती है मालूम नहीं
शाम किस तरह उतर आती है रुख़्सारों पर
- इरफ़ान सिद्दीक़ी  

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न इब्तिदा की ख़बर है न इंतिहा मालूम
रहा ये वहम कि हम हैं सो वो भी क्या मालूम
- फ़ानी बदायूंनी

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'शाइर' उन की दोस्ती का अब भी दम भरते हैं आप
ठोकरें खा कर तो सुनते हैं सँभल जाते हैं लोग
- हिमायत अली शाएर 

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Urdu Poetry: फूल खिले हैं गुलशन गुलशन लेकिन अपना अपना दामन

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