अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है
रंज कम सहता है एलान बहुत करता है
- इरफ़ान सिद्दीक़ी
दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं
- क़तील शिफ़ाई
दिन एक सितम एक सितम रात करो हो
वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो
- कलीम आजिज़
वो तपिश है कि जल उठे साए
धूप रक्खी थी साएबान में क्या
- ख़ालिदा उज़्मा
Urdu Poetry: यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का