अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई
कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़
- फ़िराक़ गोरखपुरी
यूँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
- जिगर मुरादाबादी
यही ज़िंदगी मुसीबत यही ज़िंदगी मसर्रत
यही ज़िंदगी हक़ीक़त यही ज़िंदगी फ़साना
- मुईन अहसन जज़्बी
अपने साए से चौंक जाते हैं
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा
- गुलज़ार
Urdu Poetry: उसी के क़दमों की आहट का इंतिज़ार भी है