अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जैसा मूड हो वैसा मंज़र होता है
मौसम तो इंसान के अंदर होता है
- अज़ीज़ एजाज़
गाहे गाहे की मुलाक़ात ही अच्छी है 'अमीर'
क़द्र खो देता है हर रोज़ का आना जाना
- अमीर मीनाई
दिल में इक दर्द उठा आँखों में आँसू भर आए
बैठे बैठे हमें क्या जानिए क्या याद आया
- वज़ीर अली सबा लखनवी
जिस में हो याद भी तिरी शामिल
हाए उस बे-ख़ुदी को क्या कहिए
- फ़िराक़ गोरखपुरी
Urdu Poetry: भूले से मोहब्बत कर बैठा, नादाँ था बेचारा, दिल ही तो है