Urdu Poetry: ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया
- शहज़ाद अहमद

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इंसान की बुलंदी ओ पस्ती को देख कर
इंसाँ कहाँ खड़ा है हमें सोचना पड़ा
- हबीब हैदराबादी

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छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में
ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता
- प्रेम भण्डारी

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भले ही लाख हवालों के साथ कहते हैं
मगर वो सिर्फ़ किताबों की बात कहते हैं
- सदा अम्बालवी

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पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं
- निदा फ़ाज़ली

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Urdu Poetry: सब अपने अपने घरों को पलट के देखते हैं

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