अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते
- अहमद फ़राज़
तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता
लफ़्ज़ सूझा तो मआ'नी ने बग़ावत कर दी
- अहमद नदीम क़ासमी
बाक़ी है अब भी तर्क-ए-तमन्ना की आरज़ू
क्यूँकर कहूँ कि कोई तमन्ना नहीं मुझे
- आदिल असीर देहलवी
तमन्ना तिरी है अगर है तमन्ना
तिरी आरज़ू है अगर आरज़ू है
- ख़्वाजा मीर दर्द
Urdu Poetry: ज़िंदगी आवाज़ है बातें करो बातें करो