अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का
- फ़ानी बदायूंनी
मुद्दत से ख़्वाब में भी नहीं नींद का ख़याल
हैरत में हूँ ये किस का मुझे इंतिज़ार है
- शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
उस पेड़ के हर फल में मिरा हक़ ज़रा रखना
जिस नन्हे से पौदे को शजर मैं ने किया है
- आबिदा करामत
जंगलों को काट कर कैसा ग़ज़ब हम ने किया
शहर जैसा एक आदम-ख़ोर पैदा कर लिया
- फ़रहत एहसास
Urdu Poetry: दिल कभी ख़्वाब के पीछे कभी दुनिया की तरफ़