Urdu Poetry: ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
- शकील बदायूंनी 

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हर नए हादसे पे हैरानी
पहले होती थी अब नहीं होती
- बाक़ी सिद्दीक़ी

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वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
- ख़ुमार बाराबंकवी 

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वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला फूल का है फूल किधर जाएगा
- परवीन शाकिर 

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Urdu Poetry: हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम

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