अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
- बशीर बद्र
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ
ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ
- ख़्वाजा मीर दर्द
उम्र-ए-दराज़ माँग के लाई थी चार दिन
दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में
- सीमाब अकबराबादी
तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
Urdu Shayari: बिछड़ गए महबूब के लिए शायरों के अल्फ़ाज़