अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
- साहिर लुधियानवी
ऐश ही ऐश है न सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है
- अली जव्वाद ज़ैदी
दिलों को तेरे तबस्सुम की याद यूँ आई
कि जगमगा उठें जिस तरह मंदिरों में चराग़
- फ़िराक़ गोरखपुरी
अपना घर आने से पहले
इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं
- मोहम्मद अल्वी
Urdu Poetry: जैसा मूड हो वैसा मंज़र होता है, मौसम तो इंसान के अंदर होता है