Urdu Poetry: अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ

अमर उजाला काव्य डेस्क  

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हुआ है तुझ से बिछड़ने के बा'द ये मा'लूम
कि तू नहीं था तिरे साथ एक दुनिया थी
- अहमद फ़राज़ 

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कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया
- जौन एलिया 

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शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
- बशीर बद्र 

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किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें
है वस्ल से ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार का
- ताबाँ अब्दुल हई 

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Urdu Poetry: मिर्ज़ा ग़ालिब के आसान शेर

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