अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है
- इमाम बख़्श नासिख़
ये ग़म नहीं है कि हम दोनों एक हो न सके
ये रंज है कि कोई दरमियान में भी न था
- जमाल एहसानी
एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी
एक हम हैं कि जिन्हें ग़म ने उभरने न दिया
- आज़ाद गुलाटी
रात इक शख़्स बहुत याद आया
जिस घड़ी चाँद नुमूदार हुआ
- अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
Urdu Poetry: आह जो दिल से निकाली जाएगी, क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी