अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आह जो दिल से निकाली जाएगी
क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी
- अकबर इलाहाबादी
कभी आँखें किताब में गुम हैं
कभी गुम है किताब आँखों में
- मोहम्मद अल्वी
जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं
ख़ुश वो क्या होंगे जब ख़फ़ा ही नहीं
- बाक़र मेहदी
हम ने घर की सलामती के लिए
ख़ुद को घर से निकाल रक्खा है
- अज़हर अदीब
Urdu Poetry: आहटें सुन रहा हूँ यादों की आज भी अपने इंतिज़ार में गुम