Urdu Poetry: चले आओ जहाँ तक रौशनी मा'लूम होती है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है
चले आओ जहाँ तक रौशनी मा'लूम होती है
- नुशूर वाहिदी

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ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यूँ देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
- साहिर लुधियानवी

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कौन जाने कि उड़ती हुई धूप भी
किस तरफ़ कौन सी मंज़िलों में गई
- किश्वर नाहीद 

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किस ने सहरा में मिरे वास्ते रक्खी है ये छाँव
धूप रोके है मिरा चाहने वाला कैसा
- ज़ेब ग़ौरी

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Urdu Poetry: बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है

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