Urdu Poetry: चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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गुरेज़-पा है नया रास्ता किधर जाएँ
चलो कि लौट के हम अपने अपने घर जाएँ
- जमाल ओवैसी

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ढलेगी शाम जहाँ कुछ नज़र न आएगा
फिर इस के ब'अद बहुत याद घर की आएगी
- राजेन्द्र मनचंदा बानी

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वो चार चाँद फ़लक को लगा चला हूँ 'क़मर'
कि मेरे बा'द सितारे कहेंगे अफ़्साने
- क़मर जलालवी

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है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
- बशीर बद्र

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Urdu Poetry: अब तो मिल जाओ हमें तुम कि तुम्हारी ख़ातिर

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